Thursday, September 22, 2011

आस

आस लगाये बैठा हूँ आपके आने की, 
इक अरसे बाद आपको गले लगाने की,
अकेला बैठ कर सोचता रहता हूँ तुम्हारे बारे,
पत्ते-पत्ते छान लीये चीज़ों की घर की हमारे,
आस है उसमे से कुछ तुम्हारी यादों के मिल जाने की,
आस है बांहों में तुम्हारी मर जाने की,

जी चाहता है कंधे पे सर रख कर तुम्हारे सो जाऊं,
दुनिया को भुलाकर तुम्हारी बाँहों  में कहीं खो जाऊं,
चंद दीनो की बात है,आस बढ़ रही है तुम्हारे पास आने की,
गर सांस ठहर गयी, तो अधूरी रह जायेगी आस तुम्हे पाने की,

यह आस भी बड़ी अजीब होती है,
ताउम्र छोड़ती नहीं पीछा ऐसी चीज़ होती है,
आस है अब इस तूफान के ठहर जाने की,
आस है अब इस आशियाने के बच जाने की,

"जो" बीत गयी उसे भुला देना चाहता हूँ ,
तुम्हारे साथ इक नयी ज़िन्दगी चलाना चाहता हूँ,
आस लगाये बैठा हूँ आपके मान जाने की,
सब कुछ भुलाकर मेरे  पास आने की,

आस लगाये  बैठा हूँ आपके आने की, 
इक अरसे बाद आपको गले लगाने की,
आस....................



 लेखक :- संतोष कुमार सकलानी                                                                                                         

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